Friday, February 20, 2015

॥ स्वर से अर्थ भेद ॥

॥ स्वर से अर्थ भेद ॥

वृत्र नाम की एक व्यक्ति था । इन्द्र के साथ उसकी नहीं पडती थी । इस लिए वह वृत्र एक मारण याग करना चाहता था । याग का आरम्भ भी किया । उस याग में प्रयोग करनेवाले एक मन्त्र था कि "इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व​" । इस मन्त्र में "इन्द्रशत्रु" जो शब्द है वह दो प्रकार के होते हैं - आद्युदात एवं अन्तोदात्त के रूप में । यहां पर इन्द्रशत्रु शब्द अन्तोदात्त होने पर उस का अर्थ होगा - इन्द्रस्य शत्रुः (अर्थात् इन्द्र के शमयिता या शातयिता) । आद्युदात्त होने पर अर्थ होता है कि इन्द्रः शत्रुः यस्य सः (इन्द्र जिस का शत्रु है) । यहां पर ऋत्विक के द्वारा "इन्द्र के शमयिता (मारनेवाला)" का अर्थ देनेवाले अन्तोदात्त शब्द "इन्द्रशत्रु" के प्रयोग के स्थान पर "इन्द्र जिस का शत्रु है" अर्थ देनेवाले आद्युदात्त "इन्द्रशत्रु" शब्द का प्रयोग किया गया । जिस गलती से इन्द्र को मारनेवाला अभिचार याग इन्द्र के द्वारा मारनेवाला अभिचार याग बन गया ।

यहां अन्तोदात स्वर के स्थान आद्युदात्त स्वर का प्रयोग करने से यह विपरीत हुआ । इस से यह स्पष्ट है कि स्वर के भेद से अर्थ में भी भेद हो जाता है ॥


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2 comments:

Sudarshan HS said...

आचार्याः,

ऋग्वेदे इदं पदम् अन्विष्टं मया कुतूहलेन । किन्तु मन्रः कः न ज्ञायते । सन्दर्भः कः इति अस्य मन्त्रखण्डस्य ?

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Himadri Shekhar Roy said...

यथायथं व्याख्यानम्।